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लुप्त हो रही गौरैया और पक्षियों की अन्य प्रजातियों को बचाने के लिए समाजसेवी संस्थाओं ने उठाया बीड़ा




जिस आंगन में नन्ही गौरैया की चहल कदमी होती थी आज वह आंगन सूने पड़े हुए हैं। कभी गौरैया का बसेरा इंसानों के घर में होता था। अब इनके अस्तित्व पर छाए संकट के बादलों ने इनकी संख्या काफी कम कर दी है और कहीं-कहीं तो अब यह दिखाई नहीं देती। इस संकट की घड़ी में नन्ही गौरैया को अंगने में बुलाने के लिए शहर की समाजसेवी संस्थाएं आगे आई हैं। इनवायरमेंट लवर्स और श्री गणेश वेलफेयर सोसायटी की ओर से लकड़ी के घोंसले बनवाकर शहर के पार्कों में लगवाए जा रहे हैंं।

इनवायरमेंट लवर्स क्लब के संजीव सिंगला कहते हैं कि कभी हर घर- आंगन का अहम हिस्सा रही घरेलू चिड़िया यानी पैसर डोमेस्टिक इंडिकस आजकल किसी की हथेली से दाना नहीं उठाती, किसी घर में उनके नन्हे बच्चे फुदकते नहीं नजर आते, फसलों पर कीटनाशकों का छिड़काव करना आरम्भ कर दिया इसीलिए यह विलुप्ती के कगार पर हैं।

पेड़ों को काटने से बचाना होगा
संजीव सिंगला ने कहा कहा पक्षी विज्ञानी ऑरीनथोलॉजिस्ट द्वारा चिड़िया अथवा पैसर डोमेस्टिक को एनवायरमेंट इंडिकेटर अथवा बढिय़ा वातावरण के सूचक का दर्जा दिया गया है। संस्था की ओर से बनवाए गए लकड़ी के घोंसलों को नि:शुल्क लोगों के घरों के बरामदों, रोशन दानों आदि छाया वाली जगहों पर लगाया गया जिनमें घरेलू चिड़िया ने आकर अपना रैनबसेरा बनाना शुरू कर दिया है। ब्रीडिंग के बाद इनकी संख्या बढ़नी शुरू हो जाएगी। सभी पक्षियों की प्रजातियों को वापस लाना चाहते हैं तो हमें नीम, बरगद, पीपल,कीकर, बेरी आदि के पेड़ों को काटने से रोकना पड़ेगा।

100 से अधिक घोंसले बनवाए
श्री गणेश वेलफेयर सोसायटी के प्रधान आशीष बांसल ने कहा कि खाने के तरीके बदल रहें हैं। अब हम सब पैकेट में खरीद के लाते हैं। छत पर अनाज नहीं फैलाते तो गौरैया खाएगी क्या? इन सब की वजह से गौरैया कम हो रही थी। वह कहते हैं संस्था की ओर से 100 से अधिक लकड़ी के घोंसले बनाकर शहर के पार्कांे और घरों पर रखे गए।

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