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देवझिरी सोसायटी पर कार्रवाई में उलझे अफसर, उपायुक्त ने भंग किया था, जॉइंट कमिश्नर ने बिना नोटिस दे दिया स्टे




अवयस्क किशोरियों को नियमों से परे नियुक्ति देने, प्रभारी प्रबंधन के करीबी रिश्तेदारों को सेल्समैन बनाने, नौकरी से बाहर हो चुके सेल्समैन के नाम और थंब इंप्रेशन से उचित मूल्य की दुकानों का संचालन करने जैसे गंभीर आरोपों में घेरे में आई देवझिरी सोसायटी पर कार्रवाई में अफसर अलग-अलग नियम चला रहे हैं।
उपायुक्त सहकारिता ने कांग्रेस नेताओं के समर्थन से चल रही इस संस्था को दो महीने पहले भंग कर दिया था। अब संयुक्त आयुक्त इंदौर ने इस आदेश पर स्टे दे दिया। वो भी बिना नोटिस जारी किए। अब यहां के अफसर प्रक्रिया का पालन नहीं होने के सवाल पर चुप्पी साध रहे हैं। सोसायटी का देवझिरी में लाखों रुपए खर्च कर बनाया दफ्तर खाली पड़ा है और झाबुआ शहर में एक कांग्रेस नेता के घर में किराए पर सोसायटी चलती है।
खबर है कि अब उपायुक्त ने आयुक्त को इस मामले में एक रिपोर्ट भेजी है। ये रिपोर्ट बिना नोटिस संयुक्त आयुक्त द्वारा स्टे देने को लेकर है। इसके अलावा अवैध नियुक्तियों, अंशपूंजी जमा न करने के साथ ही मोबाइल और लैपटॉप से मिली आपत्तिजनक जानकारी के दस्तावेज तैयार कर ईओडब्ल्यू (आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरा) को भी भेजे हैं। खबर ये भी है कि कांग्रेस नेताओं पर इस मेहरबानी से यहां के भाजपा नेता नाराज हैं। अफसरों से नाराजगी भी जताई है। अभी जिले की सभी आदिम जाति सेवा सहकारी समितियों में निर्वाचित बोर्ड समाप्त होने से प्रशासक नियुक्त हैं। ये प्रशासक सहकारिता विभाग के अफसर हैं। देवझिरी सोसायटी के अध्यक्ष को लोकायुक्त द्वारा पहले की गई कार्रवाई के बाद हटाया जा चुका है। अभी उपाध्यक्ष झीतरीबाई को प्रभार दिया गया है। लेकिन काम उनके पति करते हैं। इसका फायदा प्रबंधक ने उठाया और अपने रिश्तेदारों को नौकरियां बांट दी।

कोर्ट की तरह काम, इसलिए नोटिस जरूरी
उपायुक्त सहकारिता को डिप्टी रजिस्ट्रार के रूप में सिविल कोर्ट का दर्जा है। उनके आदेश को एक पक्षीय या बिना कोर्ट से रिकार्ड बुलवाए स्टे देना ठीक नहीं है। सहकारिता विभाग ने स्टेट कोऑपरेटिव ट्रिब्यूनल बनाया है, जिसका चेयरमैन हाईकोर्ट के रिटायर जज या जिला जज के स्तर का अफसर होता है। अब मामला ट्रिब्यूनल में जा सकता है।

2 करोड़ के नुकसान में संस्था
अभी देवझिरी संस्था दो करोड़ के नुकसान में चल रही है। अभी अगर यहां प्रशासक नियुक्त किया गया तो वो संस्था को हुए आर्थिक नुकसान का सरचार्ज यानि वसूली की कार्रवाई प्रबंधकों से करने की सिफारिश करेगा। इसलिए स्टे का आदेश आश्चर्यजनक है। इधर सहकारिता उपायुक्त अंबरीष वैद्य ने बीते 5 सालों में पदस्थ शाखा पर्यवेक्षकों को नोटिस जारी कर पूछा है कि उनके रहते अवैध नियुक्तियां, लाखों रुपए के घोटाले कैसे होते रहे।

जांच कमेटी बना
एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी भी बनाई है। ये बैंक संवर्ग के अलावा दूसरे कर्मियों की जांच करेगी। फिलहाल वैद्य जिला सहकारी बैंक के प्रशासक भी हैं। उनका कहना है, दोहरे प्रभार सहित अन्य गड़बड़ियों वाली सोसायटियों की सर्जरी की जाएगी। आलीराजपुर में ऐसा किया गया और दागी कर्मचारियों को हटाकर जांच शुरू की गई।

एक्स्पर्ट व्यू : इस पर स्टे नहीं दिया जा सकता
उपायुक्त सह डिप्टी रजिस्ट्रार द्वारा कोऑपरेटिव एक्ट की धारा 53 (ए) में सोसायटी या बोर्ड को भंग करने का आदेश जारी होने पर उसे सीज टू फंक्शन माना जाता है। इस पर स्टे नहीं दिया जा सकता। उपायुक्त को ऐसे बोर्ड को 3 साल तक निलंबित का भी अधिकार है। आदेश की समीक्षा की जा सकती है, स्थगित नहीं कर सकते।
महेंद्रसिंह ठाकुर, हाईकोर्ट एडवोकेट और सहकारिता विवाद विशेषज्ञ

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