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अब सम्मान से केंद्र सरकार में एंट्री भी करेगी नीतीश की पार्टी, बिहार में कम सीटों के बावजूद JDU में लौटी रौनक [Source: Dainik Bhaskar]



राजनीति में मौके की तलाश होती है, सही मौके पर ही चाल चली जाती है। बिहार की राजनीति में भी कुछ ऐसा ही हुआ। बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 74 सीट हासिल क्या कर लिए, भाजपा जदयू पर इस कदर हावी हो गई, जैसे जदयू का कोई वजूद ही नहीं। लेकिन भाजपा यह भूल गई कि जदयू के पास नीतीश हैं। जिनको बिहार की राजनीति का चाणक्य कहा जाता है। नीतीश कुमार ने उस वक्त का इंतजार किया और वह वक्त आया, जब भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश में जदयू के 6 विधायकों को तोड़ कर अपनी पार्टी में मिला लिया। फिर नीतीश कुमार ने अरुणाचल प्रदेश के बहाने बिहार और केंद्र की राजनीति को ऐसे साधा कि भाजपा नीतीश कुमार के सामने नतमस्तक हो गई।

लोकसभा से लेकर अब तक नीतीश की थी मजबूरी
बात 2019 लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद शुरू हुई। भाजपा ने अपने सभी घटक दलों के साथ चुनाव तो लड़ा था, लेकिन परिणाम भाजपा के पक्ष में प्रचंड बहुमत के रूप में आया था। अकेले भाजपा 303 सीट लाकर बहुमत से काफी आगे थी। ऐसे में दूसरे घटक दलों की सांकेतिक हिस्सेदारी के तौर पर मंत्रिमंडल का विस्तार किया गया। नीतीश कुमार ने अनुपातिक हिस्सेदारी की बात कहकर मंत्रिमंडल में हिस्सा नहीं लिया। लेकिन, वे NDA में बने रहे। बिहार विधानसभा में भी भाजपा ने 74 सीट हासिल करके जदयू के सामने बड़ी लकीर खींच दी। ऐसे में नीतीश मजबूर हो गए। भाजपा ने मंत्रिमंडल से लेकर विधानसभा स्पीकर तक में अपनी मनमानी की।

मौके का किया इंतजार
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तब तक मुंह नहीं खोला, जबतक कि उनके पास मौका नहीं आया। अरुणाचल प्रदेश की घटना ने नीतीश कुमार को बड़ा मौका दे दिया। हालांकि नीतीश कुमार इस मौके की तलाश में थे। इसलिए उन्होंने अपने सबसे खास RCP सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर केंद्र स्तर पर उनके निर्णय को अधिकृत कर दिया। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नीतीश कुमार ने इशारों-इशारों में भाजपा का पुराना इतिहास भी दोहरा दिया और यह भी बता दिया कि उनके चेहरे के बदौलत ही भाजपा इस मुकाम पर पहुंची है कि वह विधानसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी है। इस के बाद रही सही कसर RCP सिंह ने निकाल दी। भाजपा आला कमान को यह बात समझते देर नहीं लगी कि नीतीश कुमार नाराज हैं। और ये नाराजगी भाजपा के लिए नुकसान पहुंचा सकती है।

RCP को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर, अपने लिए प्रोटोकॉल बनाया
लेकिन, तब तक नीतीश कुमार ने भाजपा के सामने एक ऐसी लकीर खींच दी कि भाजपा के नेता सीधे नीतीश कुमार से मुखातिब नहीं हो सकते थे। नीतीश कुमार जब जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, तब छोटी-छोटी बातों का भी फैसला उन्हें करना पड़ता था। भाजपा के बढ़े कद के सामने नीतीश कुमार अपने आप को असहज महसूस करते थे। वैसे भी भाजपा में उनके अजीज मित्र अरुण जेटली के निधन के बाद नीतीश कुमार किसी को भी बहुत गंभीरता से नहीं लेते थे। अब जब RCP सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं तो जो बातें होंगी, वो RCP सिंह के स्तर पर ही होंगी। भाजपा पर नीतीश कुमार के बजाय RCP दबाव बना सकते हैं। गुरुवार को जब भूपेंद्र यादव को नीतीश कुमार से मिलना था तो पहले वे RCP के पास गए और 80 फीसदी बात फाइनल हुई तो वे आगे नीतीश कुमार के पास अपने सभी नेताओं के साथ पहुंचे।

अब भाजपा नीतीश कुमार के ग्रिप में
गुरुवार के भाजपा नेताओं और नीतीश कुमार की मुलाकात के बाद बिहार मंत्रिमंडल और राज्यपाल मनोनयन के मामले को अमलीजामा पहना दिया गया है। वहीं केंद्र में अनुपातिक हिस्सेदारी पर RCP सिंह खरमास के बाद दिल्ली जाएंगे, जहां सांकेतिक नहीं, अनुपातिक पर बात फाइनल होने की बात सामने आ रही है। सूत्रों के मुताबिक बिहार मंत्रिमंडल का विस्तार 16 जनवरी तक हो जाएगा। वहीं राज्यपाल मनोनयन का मामला भी खरमास के तुरंत बात सुलझा लिया जाएगा। भाजपा जिस तेजी के साथ बिहार में चल रही थी, उसपर नीतीश कुमार ने ऐसे ब्रेक लगाया कि वो अब नीतीश कुमार के पीछे-पीछे चलने को तैयार है।

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार।

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